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| अंग्रेज़ों की कालोनियों के स्वतंत्रता का समय चित्र |
इंपीरियलिज़्म या साम्राज्यवाद की दुनिया में ब्रिटेन को सबसे बड़ी शक्ति माना जाता था, जिसका साम्राज्य अफ्रीका के तट से लेकर इंडोनेशिया और उससे आगे ऑस्ट्रेलिया तक फैला हुआ था। साउथ अफ्रीका जहां महात्मा गांधी ने रंगभेद के खिलाफ अपना पहला सत्याग्रह किया, से लेकर ऑस्ट्रेलिया, जहां आज भी औपचारिक रूप से ब्रिटिश राजसत्ता को अपना मुखिया मानता है, जो उस साम्राज्य की दीर्घकालिक विरासत को दिखाता है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन को यह एहसास होने लगा कि उसकी साम्राज्यवादी शक्ति क्षीण होती जा रही है और दूर-दूर फैली कॉलोनियों को चलाने की लागत उसके लिए अत्यधिक बोझ बन गई है। इसी कारण ब्रिटेन ने क्रमशः अपनी विभिन्न कॉलोनियों को स्वतंत्रता देना शुरू किया, पर इस क्रम में भारत को एक विशिष्ट और अग्रणी स्थान मिला। भारत ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण कॉलोनी होने के बावजूद सबसे पहले स्वाधीन हुआ, जबकि अन्य कॉलोनियाँ 1960 के दशक से लेकर 1970 और कुछ तो 1980 के दशक तक ब्रिटिश शासन के अधीन रहीं। तो ऐसा क्या कारण था कि सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण कॉलोनी होने के बावजूद, भारत को अपेक्षा से पहले स्वतंत्रता मिली ?
सामान्यतः यह माना जाता है कि 1942 का महात्मा गांधी के नेतृत्व वाला भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) भारत को स्वतंत्रता दिलाने का मुख्य कारण था। निस्संदेह, कांग्रेस के नेतृत्व में चले अहिंसक आंदोलनों और जन-आंदोलनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही, परंतु केवल यही कारण भारत को अन्य कॉलोनियों की तुलना में जल्दी स्वतंत्रता मिलने की पूरी व्याख्या नहीं करता।
एक गहरा, अपेक्षाकृत कम चर्चा में आने वाला कारण 1945 के बाद भारतीय सेना की कुछ टुकड़ियों में उत्पन्न हुई सैन्य हलचलें और विद्रोह की भावना है। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के बाद भारतीय सैनिकों के व्यवहार और दृष्टिकोण में आए परिवर्तन ने ब्रिटिश शासन के आत्मविश्वास को गंभीर रूप से हिलाया और उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया कि यदि सेना उनके आदेशों से विमुख हो जाती है तो साम्राज्य को टिकाए रखना लगभग असंभव हो जाएगा। यह कैसे हुआ इसे समझने के लिए 1942 के एक और घटनाक्रम को जानते हैं।
हम जानते हैं कि 1941 में ही नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेज़ों चकमा देकर उनकी नजरबंदी (house arrest) से पलायन किया और अफगानिस्तान के रास्ते यूरोप पहुँचे। वहाँ उन्होंने हिटलर से मुलाकात की और भारत की स्वतंत्रता के लिए एक सैन्य बल - आज़ाद हिंद फौज - के गठन में सहयोग की मांग की। हिटलर का रवैया नस्लभेद और रंगभेद से प्रेरित होने के कारण वह एक अश्वेत (brown) सुभाष चंद्र बोस को पूरी तरह खुले दिल से सहयोग देने को तैयार नहीं था, किंतु ब्रिटेन के प्रति शत्रुता के चलते उसने सीमित सहयोग अवश्य दिया और अपनी एक पनडुब्बी से उन्हें जापान भेजने की व्यवस्था की।
वहीं दूसरी ओर 1941 से भारतीय फ़ौज (जो कि उस समय अंग्रज़ों की और से लड़ रही थी) की कुछ टुकड़ियां सिंगापुर, मलेशिया और बर्मा में तैनात थीं। उन्हें जापानी हमले में मुँह की खानी पड़ी और उनमें से कईं सानिकों को युद्धबंदी बना लिया गया। 1942 आते आते मोहन सिंह, प्रीतम सिंह और राश बिहारी बोस के नितृत्व में इन युद्ध बंदियों और इन देशों में स्थित भारतीय मूल के निर्वासित (exiled) रहिवासियों ने मिल कर एक फ़ौज का निर्माण कर लिया था।
1943 में जापान पहुँचकर नेताजी ने इन सबके सहयोग से भारतीय युद्धबंदियों और अन्य भारतोयों को संगठित कर आज़ाद हिंद फौज की स्थापना की। इस प्रक्रिया में लंबे समय से ऐसे प्रयास करते रहे रास बिहारी बोस की भूमिका भी अत्यंत अहम रही, जिनके आधार पर आज़ाद हिंद फौज का सैन्य ढांचा तैयार हुआ और यह फौज भारत की दिशा में अग्रसर हुई।
आज़ाद हिंद फौज की लड़ाई, हार, युद्धबंदी और लाल किला मुकदमे
आज़ाद हिंद फौज ने बर्मा की दिशा से आते हुए भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्रों की ओर सैन्य अभियान चलाया और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध कई हमले किए। परंतु जर्मनी और उसके सहयोगी देशों तथा जापान की पराजय के साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध का समीकरण बदल गया। जापान ने शायद द्वितीय विश्व युद्ध की सबसे बडी कीमत चुकाई जब हिरोशिमा और फिर नागासाकी शहरों पर अणुबम से हमला हुआ।
जापान की हार के फलस्वरूप आज़ाद हिंद फौज के अनेक सैनिकों को भारतीय सेना द्वारा वापस युद्धबंदी बना लिया गया और उन पर देशद्रोह का इलज़ाम लगाया गया। लेकिन क्योंकि वे सैनिक जापान की ओर से नहीं लड़ रहे थे, तथापि उनका उद्देश्य भारत की स्वतंत्रता था, इसलिए भारतीय जनमानस उन्हें देशद्रोही नहीं, बल्कि देशभक्त मानता था।
ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में हालांकि ये सैनिक देशद्रोही थे। भविष्य में कोई दूसरी टुकड़ी इस प्रकार की "देशद्रोह की हिमाकत" न करे, इस उद्देश्य से अंग्रेजों ने तय किया कि आज़ाद हिंद फौज के अधिकारियों पर सार्वजनिक मुकदमा चलाया जाएगा, ताकि उन्हें मिसाल बनाकर भय का माहौल पैदा किया जा सके। इसी कारण दिल्ली के लाल किले को इस मुकदमे का स्थान चुना गया, जो ब्रिटिश रणनीति की बड़ी भूल साबित हुई। मुकदमा चलाना पहली भूल थी, और उसे अत्यंत सार्वजनिक, व्यापक और दिखावटी तरीके से आयोजित करना दूसरी और भी बड़ी भूल साबित हुई।
इन मुकदमों में आज़ाद हिंद फौज के कमांडर-इन-चीफ सहित कई वरिष्ठ अधिकारी आरोपित किए गए, जिनमें जनरल शाहनवाज़ हुसैन, जनरल कुंदन लाल सहगल और जनरल ग़ुरबक्ष सिंह ढिल्लों प्रमुख अभियुक्तों में से थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू और भारत के कई नामचीन वकीलों ने इन अभियुक्तों की ओर से बचाव किया। मुकदमे की कार्यवाही देश भर में फैली और इससे अंग्रेजों के प्रति पहले से मौजूद रोष और अधिक प्रबल हो गया - न केवल आम नागरिकों के मन में, बल्कि सैन्य बलों के सिपाहियों के मन में भी।
बॉम्बे नेवल डॉकयार्ड / रॉयल इंडियन नेवी म्यूटिनी
आज़ाद हिंद फौज के मुकदमों से उपजा आक्रोश केवल न्यायालयों और अखबारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय सेना के जवानों और नौसैनिकों के मन में भी फैल गया। इसी पृष्ठभूमि में कहानी हमें उस स्थान पर ले जाती है जिसे आज मुंबई का नेवल डॉकयार्ड कहा जाता है और जिसे उस समय बॉम्बे डॉकयार्ड के नाम से जाना जाता था।
आज के मुंबई में काला घोड़ा क्षेत्र एक प्रसिद्ध कला उत्सव और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में जाना जाता है। वहाँ से समुद्र की ओर सीधे बढ़ने पर "लायंस गेट" नामक द्वार मिलता है, जो सदैव बंद रहता है क्योंकि वह भारतीय नौसेना के डॉक का प्रवेश द्वार है। उसके आसपास और भी द्वार हैं जो सभी बंद रहते हैं, क्योंकि पूरा क्षेत्र भारतीय नौसेना के नियंत्रण में आने वाला सैन्य डॉकयार्ड है। इसके आगे सिविलियन डॉक भी हैं जहाँ व्यापारी और यात्री जहाज रुकते हैं, पर मुख्य भाग सैन्य उपयोग के लिए ही था और है।
इसी बॉम्बे डॉकयार्ड में भारतीय नौसेना के जवानों और कर्मियों ने सबसे पहले विद्रोह का बिगुल बजाया - यही रॉयल इंडियन नेवी म्यूटिनी या बॉम्बे नेवल म्यूटिनी थी। कुछ ही दिनों में यह विद्रोह मुंबई से पश्चिम ओर करांची और पूर्व की ओर कलकत्ता तक फ़ैल गया। नौसैनिकों के इस विद्रोह ने अंग्रेजों को भयभीत कर दिया, क्योंकि उन्हें एहसास हुआ कि यदि भारतीय सेना और नौसेना की अन्य टुकड़ियाँ भी इसी प्रकार विद्रोह करने लगीं तो वे योजनाबद्ध तरीके से भारत छोड़ने की बजाय अपमानजनक रूप से खदेड़े जाएँगे और उनका साम्राज्य पूरी तरह ढह जाएगा।
फरवरी 1946 की म्यूटिनी और अंतरिम सरकार का गठन
फरवरी 1946 में बॉम्बे नेवल म्यूटिनी भले ही सैन्य दृष्टि से पूर्णतः सफल नहीं हो सकी, पर उसके राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव अत्यंत गहरे थे। इस विद्रोह ने ब्रिटिश शासकों को स्पष्ट संकेत दे दिया कि भारतीय सेना अब पूरी तरह उनके नियंत्रण में नहीं है और किसी व्यापक विद्रोह की स्थिति में उन्हें भारत से भागने पर मजबूर होना पड़ सकता है।
इसी भय और वास्तविकता के संयुक्त दबाव में अंग्रेजों ने तुरंत एक अंतरिम सरकार के गठन के कदम उठाए। कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली के सदस्यों से कहा गया कि वे एक अंतरिम सरकार चुनें, जिसके तहत जवाहरलाल नेहरू को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया और सरदार पटेल को उपप्रधान मंत्री। लॉर्ड माउंटबेटन को भारत का आखिरी गवर्नर जनरल घोषित किया गया और विभाजन तथा स्वतंत्रता की दिशा में निर्णायक कदम उठाए गए।
भारत को अगस्त 1947 में स्वतंत्रता मिली, जबकि संविधान तैयार होते-होते 1951 तक का समय लगा। ब्रिटिश साम्राज्य की अन्य कॉलोनियों को इससे काफी बाद स्वतंत्रता मिली, पर भारत को अपेक्षाकृत जल्दी स्वाधीनता इसलिए मिली कि यहाँ केवल जनांदोलन नहीं, बल्कि सेना और नौसेना के भीतर से भी विद्रोह की आवाज़ उठ चुकी थी - जिसकी शुरुआत आज़ाद हिंद फौज और उसके मुकदमों से प्रेरित बॉम्बे नेवल म्यूटिनी से होती है।
यहाँ यह लिखना उल्लेखनीय होगा कि युद्ध समाप्ती पर आज़ाद हिंद फौज की कहानी ब्रिटिश साम्राज्य के लिए इतने भड़काऊ और विस्फोटक स्वरूप की मानी गई कि पूरे साम्राज्य में व्यापक विद्रोह और बगावतों के भय से ब्रिटिश सरकार ने बीबीसी (British Broadcasting Corporation) को उनके बारे में कोई प्रसारण करने से सख्ती से रोक दिया। वियतनाम और इंडोनेशिया में डच तथा फ्रांसीसी शासन की पुनर्स्थापना के लिए भारतीय सैनिकों का उपयोग किए जाने से भारतीय सेना में पहले से बढ़ रही नाराज़गी और असंतोष को और तेज़ बढ़ावा मिला। आज़ाद हिंद फौज से प्रेरित हड़तालें और विरोध-आंदोलन ब्रिटेन की दक्षिण-पूर्व एशियाई कॉलोनियों में भी जगह-जगह उभरने लगे, और मलेशिआ व सिंगापुर में मौजूद पूर्व INA सैनिकों ने युद्धोत्तर पूर्वी एशिया की इन कॉलोनियों में ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देने के लिए अपनी उसी संघर्ष-चेतना और अनुभवों को आधार बनाया।
"लास्ट नेल इन द कॉफिन" और स्वतंत्रता का स्वरूप
गांधी जी का 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन निश्चित रूप से भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है और उसकी भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता। परंतु यदि हम उस अंतिम निर्णायक प्रहार की तलाश करें जिसने ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में "लास्ट नेल इन द कॉफिन" का काम किया, तो वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज के खिलाफ चलाए गए लाल किला मुकदमे और उनसे प्रेरित रॉयल इंडियन नेवी म्यूटिनी के रूप में दिखाई देता है।
इन मुकदमों ने जनता के मन में आज़ाद हिंद फौज के सैनिकों को शहीद, नेता और नायक के रूप में स्थापित किया, और बॉम्बे नेवल म्यूटिनी ने यह संदेश दिया कि भारतीय सैनिक ऐसी सरकार का समर्थन नहीं करेंगे जो देशभक्तों को देशद्रोही मानकर सज़ा देना चाहती है। इस समूची प्रक्रिया ने ब्रिटेन को यह स्वीकार करने पर मजबूर किया कि भारत की स्वतंत्रता अब टाली नहीं जा सकती। इसीलिए कहा जा सकता है कि भारत ने अपनी स्वतंत्रता केवल प्राप्त नहीं की, बल्कि उसे संघर्ष, बलिदान और विद्रोह के माध्यम से छीन कर हासिल किया - यह स्वतंत्रता हमें किसी ने सहज रूप से हथेली पर रखकर नहीं दी।
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